ण्यन्तात् श्र्यादिभ्यश्च च्लेश्चङ् स्यात् कर्त्रर्थे लुङि परे।
अकामि अ त इति स्थिते।
५२८- णिश्रिद्रुमुभ्यः कर्तरि चङ्। णिश्च श्रिश्च द्रुश्च स्रुश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः णिश्रिद्रुम्भवः, तेभ्यः णिश्रिद्रुमुभ्यः। णिश्रिद्रुमुभ्यः पञ्चम्यन्तं, कर्तरि सप्तम्यन्तं, चङ् प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। च्लि लुङि से लुङि और च्लेः सिच् से च्लेः की अनुवृत्ति आती है।
णि अन्त में हो ऐसे धातु और श्रि, द्रु, सु धातुओं से परे च्लि के स्थान पर चङ् आदेश होता है कर्त्रर्थक लुङ् के परे होने पर।
प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् यह एक परिभाषा है। जहाँ-जहाँ प्रत्ययों का ग्रहण होता है, वहाँ-वहाँ प्रत्ययान्त का ग्रहण होता है अर्थात् जैसे इस सूत्र में णि का ग्रहण किया गया है तो इससे णि अन्त में ऐसे धातु को लिया गया। चकार और ङकार की इत्संज्ञा होती है, केवल अकार बचता है।