Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 525
णिङ्विधायकं विधिसूत्रम्
कमेर्णिङ्
Aṣṭādhyāyī 3.1.30
Vṛtti Varadarājācārya

कमु कान्तौ॥२॥

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स्वार्थे। डित्त्वात्तङ्। कामयते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

कमु कान्तौ। कमु धातु कान्ति अर्थात् इच्छा अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा होती है और इससे गुप्त धातु से जिस तरह आय प्रत्यय हुआ था उसी तरह स्वार्थ में णिङ् प्रत्यय होता है। उसके बाद सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होकर लकार आते हैं।

५२५- कमेणिङ्। कमेः पञ्चम्यन्तं, णिङ् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

कम् धातु से स्वार्थ में णिङ् प्रत्यय होता है।

अनिर्दिष्टार्थाः प्रत्ययाः स्वार्थे भवन्ति। सूत्र में कोई अर्थ निर्देश नहीं है, अतः यह प्रत्यय स्वार्थिक है अर्थात् धातु के अर्थ को ही पुष्ट करता है, विशेष अर्थ नहीं लाता। णिङ् में णकार और ङकार की इत्संज्ञा होती है। इ बचता है। इसके ङित् होने से अनुदात्तङित आत्मनेपदम् से आत्मनेपद होता है। णित् होने के कारण वृद्धि आदि कार्य होते हैं।

कामयते। कम् धातु है, उकार की इत्संज्ञा होने के बाद कम् से कमेर्णिङ् से णिङ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होने के बाद कम्+इ बना। अत उपधायाः से ककारोत्तरवर्ती अकार को वृद्धि होने पर काम्+इ, वर्णसम्मेलन होने पर कामि बना। कामि की सनाद्यन्ता धातवः से धातुसंज्ञा होकर लट् लकार, त, शप् करके कामि+अ+त बना। शप् वाले अकार के परे होने पर सार्वधातुकार्धधातुकयोः से कामि के इकार को गुण करके कामे+अत बना। अय् आदेश होकर काम्+अय्+अत बना। वर्णसम्मेलन होकर कामयत बना। टित आत्मनेपदानां टेरेः से एत्व होकर कामयते सिद्ध हुआ। कामयते, कामयेते, कामयन्ते, कामयसे, कामयेथे, कामयध्वे, कामये, कामयावहे, कामयामहे।