Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 523
सुडागमविधायकं विधिसूत्रम्
सुट् तिथोः
Aṣṭādhyāyī 3.4.107
Vṛtti Varadarājācārya

लिङस्तथोः सुट्। यलोपः। आर्धधातुकत्वात् सलोपो न।

एधिषीष्ट। एधिषीयास्ताम्। एधिषीरन्। एधिषीष्ठाः। एधिषीयास्थाम्।

एधिषीध्वम्। एधिषीय। एधिषीवहि। एधिषीमहि। एधिष्ट। एधिषाताम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५२३- सुट् तिथोः। सुट् प्रथमान्तं तिथोः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। लिङः सीयुट् से लिङः की अनुवृत्ति आती है।

लिङ् लकार के त और थ को सुट् का आगम होता है।

सुट् में टकार और इकार की इत्संज्ञा होती है। इत्संज्ञा का फल लोप है। केवल स् शेष रहता है। टित् होने के कारण यह तकार और थकार के आदि में बैठता है। इस तरह त के पहले लगने से स्त, आताम् में तकार के पहले होने पर आस्ताम्, थास् में थकार के पहले लगने से स्थास् और आथाम् में भी थकार के पहले लगने से आस्थाम् बन जाते हैं।

विधिलिङ् में भी सुट् आगम होता है किन्तु उसका लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य से लोप हो जाने के कारण सुट् आगम का कोई फल नहीं रह जाता है। आशीर्लिङ् में सकार का लोप प्राप्त नहीं होता, क्योंकि यह लकार लिङाशिषि से आर्धधातुक बना है और उसको होने वाला सीयुट् आगम भी आर्धधातुक ही माना जाता है। लोपविधायक सूत्र सार्वधातुक सकार का ही लोप करता है।

एधिषीष्ट। एध् धातु से आशीर्वाद अर्थ में लिङ् लकार, उसके स्थान पर त आदेश, उसकी लिङाशिषि से आर्धधातुक-संज्ञा, लिङः सीयुट् से सीयुट् का आगम, अनुबन्धलोप, एध्+सीय्+त बना। सीय् की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा और उसको आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् आगम, एध्+इ+सीय्+त बना, तकार को सुट् तिथोः से सुट् का आगम, अनुबन्धलोप, एध्+इ+सीय्+स्त बना, यकार का लोप, इकार से परे सीय् के सकार का और ईकार से परे स्त के सकार का आदेशप्रत्यययोः से षत्व, पकार से परे तकार का ष्टुना ष्टुः से टुत्व, एध्+इ+षी+ष्ट बना। वर्णसम्मेलन हुआ- एधिषीष्ट।

इस प्रकार से एधिषी (वल् परे होने पर यकार का लोप, अन्यत्र नहीं) बना लेने के बाद यदि सुट् आगम हुआ है तो सुट् के सकार का भी षत्व और तकार-थकार का टुत्व (थकार का टुत्व ठकार) आदि करके (इट् में अकार आदेश) एध् के आशीर्लिङ् में रूप बनते हैं- एधिषीष्ट, एधिषीयास्ताम्, एधिषीरन्, एधिषीष्ठाः, एधिषीयास्थाम्, एधिषीध्वम्(यहाँ पर इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात् से ढ नहीं होता, क्योंकि धि का इकार इण् में तो आता है पर वह सीयुट् को विहित होने के कारण उसके परे रहते एध् मात्र की अङ्गसंज्ञा होती है और एध् इणन्त नहीं है तथा एधि इणन्त होने पर भी अङ्ग नहीं है।

एधिषीय, एधिषीवहि, एधिषीमहि। इनकी प्रक्रिया सरल ही है।

एधिष्ट। एध् धातु से लुङ् लकार में त प्रत्यय, आडजादीनाम् से आट् आगम करके आ+एध्+त बना। च्लि और उसके स्थान पर सिच्, अनुबन्धलोप, सकार शेष, उसकी

आर्धधातुक संज्ञा और उसको वलादिलक्षण इट् आगम करने पर आ+एध्+इस्+त बना। आ+एध् में आटश्च से वृद्धि होकर ऐध् बना, इस् में सकार को पत्व और षकार से परे टकार का टुत्व करके ऐध्+ इष्+ट बना। वर्णसम्मेलन हुआ- ऐधिष्ट।

ऐधिषाताम्। एध् धातु से लुङ् लकार में आताम् प्रत्यय, आडजादीनाम् से आट् आगम करके आ+एध्+आताम् बना। च्लि और उसके स्थान सिच्, अनुबन्धलोप, सकार शेष, उसकी आर्धधातुक संज्ञा और उसको वलादिलक्षण इट् आगम करने पर आ+एध्+इस्+आताम् बना। आ+एध् में आटश्च से वृद्धि होकर ऐध् बना, इस् में सकार को पत्व करके ऐध्+ इष्+आताम् बना। वर्णसम्मेलन हुआ- ऐधिषाताम्।