Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 456
णित्वातिदेशविधायकम् अतिदेशसूत्रम्
णलुत्तमो वा
Aṣṭādhyāyī 7.1.91
Vṛtti Varadarājācārya

उत्तमो णल् वा णित् स्यात्।

जगाद, जगद। जगदिव। जगदिम। गदिता। गदिष्यति। गदतु। अगदत्।

गदेत्। गद्यात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

हुआ तो ग् के स्थान पर ज् हुआ, ज+गद+अ बना। जगद् में गकारोत्तरवर्ती अकार की अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा से उपधासंज्ञा हुई और अत उपधायाः से उपधा में स्थित हस्व अकार की वृद्धि हुई तो जगाद+अ बना, वर्णसम्मेलन होने पर जगाद सिद्ध हुआ। यहाँ पर णित् प्रत्यय परे है अ, क्योंकि जब तिप् के स्थान पर णल् हुआ तो णकार की इत्संज्ञा की गई थी। इस तरह लिट्-लकार में प्रथमपुरुष एकवचन और उत्तमपुरुष एकवचन में णित् मिलेगा एवं उसी के परे रहने पर ही वृद्धि होगी अन्यत्र नहीं।

जगदतुः। जगदुः। गद् से तस्, अतुस्, द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, कवर्ग आदेश, जगद+अतुस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ और सकार को रुत्वविसर्ग हुआ तो जगदतुः बना। इसी तरह जगदुः भी बनेगा।

जगदिथ। मध्यमपुरुष के एकवचन में सिप् के स्थान पर थल् होगा और उसको इट् का आगम करके शेष प्रक्रिया पूर्ववत् ही रहेगी। द्विवचन और बहुवचन में जगदतुः की तरह ही प्रक्रिया करके जगदथुः और जगद भी बनाइये।

४५६- णलुत्तमो वा। णल् प्रथमान्तम्, उत्तमः प्रथमान्तं, वा अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। गोतो णित् से णित् की अनुवृत्ति आती है।

उत्तम पुरुष वाले णल् को विकल्प से णित् माना जाय।

प्रथमपुरुष और उत्तमपुरुष में दो णल् हैं, इसलिए प्रथमपुरुष के णल् को रोकने के लिए उत्तमः को पढ़ा गया। यह अतिदेश सूत्र है। णल् में णित् तो स्वतः रहता ही है, किन्तु विशेष कार्यसिद्धि के लिए पहले से विद्यमान णित्व को इस सूत्र में विकल्प से णित्व मानने का विधान प्राप्त होता है। णित्व होते हुए भी एक बार उसे णित् माना जाय और एक बार न माना जाय। वैकल्पिक णित्व का प्रयोजन जगाद-जगद आदि दो रूप बनाना है।

जगाद, जगद। अन्य प्रक्रिया पूर्ववत् करके अत उपधायाः से वृद्धि करने से पहले णलुत्तमो वा से णिद्विकल्प करके उसके बाद वृद्धि करें। णित्व के पक्ष में अत उपधायाः से वृद्धि होगी और णित् न होने के पक्ष में वृद्धि नहीं होगी। इस तरह दो रूप बनते हैं।

जगदिव। जगदिम। इनमें विशेषतया वस्, मस् के स्थान पर व और म आदेश होने के बाद आर्धधातुकस्येद् वलादेः से इट् आगम होकर जगदिव, जगदिम ये दो रूप सिद्ध होते हैं।

इस तरह से गद् के लिट् लकार में निम्नानुसार रूप बने- जगाद, जगदतुः, जगदुः, जगदिथ, जगदथुः, जगद, जगाद-जगद, जगदिव, जगदिम।

लुट् में गद् से तिप् आदि आदेश, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् को बाधकर तासि प्रत्यय, उसकी आर्धधातुकसंज्ञा, उसको इट् का आगम, डा आदि आदेश, टि का लोप, वर्णसम्मेलन

आदि करके रूप बनते हैं- गदिता, गदितारौ, गदितारः। गदितासि, गदितास्थः, गदितास्थ।

गदितास्मि, गदितास्वः, गदितास्मः।

लृट्- गदिष्यति, गदिष्यतः, गदिष्यन्ति। गदिष्यसि, गदिष्यथः, गदिष्यथ। गदिष्यामि,

गदिष्यावः, गदिष्यामः। लोट्- गदतु-गदतात्, गदताम्, गदन्तु। गद-गदतात्, गदतम्,

गदत, गदानि, गदाव, गदाम। लङ्- अगदत्, अगदताम्, अगदन्। अगदः, अगदतम्,

अगदत। अगदम्, अगदाव, अगदाम। विधिलिङ्- गदेत्, गदेताम्, गदेयुः। गदेः, गदेतम्,

गदेत। गदेयम्, गदेव, गदेम। आशीर्लिङ्- गद्यात्, गद्यास्ताम्, गद्यासुः। गद्याः, गद्यास्तम्,

गद्यास्त। गद्यासम्, गद्यास्व, गद्यास्म।