Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 446
सलोपविधायकं विधिसूत्रम्
इट ईटि
Aṣṭādhyāyī 8.2.28
Vṛtti Varadarājācārya

इटः परस्य सस्य लोपः स्यादीटि परे।

वार्तिकम्- सिञ्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः। आतीत्। आतिष्ठाम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४४६- इट ईटि। इटः पञ्चम्यन्तम्, ईटि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में रात्सस्य से सस्य और संयोगान्तस्य लोपः से लोपः की अनुवृत्ति आती है।

इट् से ईट् परे होने पर बीच के सकार का लोप होता है।

इट् और ईट् दोनों ही आगम हैं। इट् आर्धधातुकस्येड् वलादेः आदि सूत्र से किया गया है और ईट् अस्तिसिचोऽपृक्ते से। इट ईटि इस सूत्र से सकार के लोप होने के बाद इ+ई में अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ करना था किन्तु इट ईटि ८.२.२८ यह सूत्र त्रिपादी

है, इसके द्वारा किया गया कार्य सपादसप्ताध्यायी अकः सवर्णे दीर्घः ६.१.१०१ की दृष्टि में पूर्वत्रासिद्धम् के नियमानुसार असिद्ध है। बीच में सकार दीखने के कारण अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ एकादेश नहीं हो रहा था तो वार्तिककार को वार्तिक बनाना पड़ा-

सिच्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः। एकादेश विधि की कर्तव्यता में सिच् का लोप सिद्ध होता है। अन्यत्र तो सपादसप्ताध्यायी की दृष्टि में त्रिपादी असिद्धा होती है किन्तु कोई एकादेश की विधि करनी हो तो सिच् का लोप सिद्ध माना जायेगा। इस प्रकार से दीर्घरूप एकादेश की विधि में सकार का लोप सिद्ध हो जायेगा। फलतः अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ हो जायेगा।

आतीत्। अत् धातु से लुङ् लकार, आडजादीनाम् से आट् आगम, तिष् आदेश करके आ अत् ति बना, च्लि, सिच् आदेश, अनुबन्धलोप होकर ति में इकार का इतश्च से लोप करके आ+अत्+स्+त् बना। सिच् के सकार की आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा, उसको आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् का आगम, टित् होने से सकार के आदि में बैठा, आ+अत्+ इस्+त् बना। तकार की अपृक्तसंज्ञा करके अस्तिसिचोऽपृक्ते से ईट् का आगम हुआ और वह भी टित् होने के कारण अपृक्त तकार के आदि में बैठा, आ+अत्+इस्+ई+त् बना। सकार का इट ईटि से लोप हुआ और सवर्णदीर्घ की कर्तव्यता में सिच्लोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः इस वार्तिक से त्रिपादी लोप भी अकः सवर्णे दीर्घः की दृष्टि में सिद्ध ही हुआ तो उससे इ+ई में सवर्णदीर्घ एकादेश ई हुआ। आ+अत्+ई+त् बना, आ+अत् में आटश्च से वृद्धि हुई और आत्+ई+त् में वर्णसम्मेलन हुआ- आतीत्।

आतिष्टाम्। तस् में आ+अत्+इस्+ताम् बना लेने के बाद वृद्धि कर आतिस् ताम् में सकार का आदेशप्रत्यययोः से षत्व और षकार से परे ताम् के तकार को ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व होकर टकार बन गया, आतिष् टाम् बना हुआ है, वर्णसम्मेलन कर देने पर आतिष्टाम् सिद्ध हो जाता है। यहाँ ताम् यह अपृक्त नहीं है, अतः दीर्घ ईट् आगम नहीं हुआ।