विद्यमानात् सिचोऽस्तेश्च परस्यापृक्तस्य हल ईडागमः।
४४५- अस्तिसिचोऽपृक्ते। अस्तिश्च सिच् च तयोः समाहारद्वन्द्वः- अस्तिसिच्, तस्य अस्तिसिचः। यहाँ पर समास की एक अन्य प्रक्रिया भी बताई गई है- सिच् च अस् च तयोः समाहारद्वन्द्वः सिचः, अस्तिश्चासौ सिचश्च अस्तिसिचः, सौत्रात् पञ्चमी का लुक्। अस्तिसिचः पञ्चम्यन्तम्, अपृक्ते सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उतो वृद्धिर्लुकि हलि से हलि और ब्रुव ईट् से ईट् की अनुवृत्ति आती है।
विद्यमान सिच् प्रत्यय और अस् धातु से परे अपृक्त हल् को ईट् का आगम होता है।
विद्यमान सिच् कहने से यह सूत्र केवल लुङ्-लकार में ही लगेगा, क्योंकि च्लि और च्लि के स्थान में होने वाला सिच् लुङ्-लकार में ही होता है। जो विद्यमान सिच् उससे या अस् धातु से परे अपृक्तसंज्ञक हल् को ईट् आगम का विधान किया गया। इसमें ई टित् है और ईकार दीर्घ है। टित् होने से अपृक्त के आदि में बैठेगा। अपृक्त हल् तिप् और सिप् में इनके इकार के लोप होने के बाद ही मिलता है। अतः यह सूत्र तिप् और सिप् में ही लगता है। स्मरण रहे कि एक अल् वाले प्रत्यय की अपृक्त एकाल् प्रत्ययः से अपृक्तसंज्ञा होती है।