Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 433
गुणवृद्धिनिषेधकं विधिसूत्रम्
क्ङिति च
Aṣṭādhyāyī 1.1.5
Vṛtti Varadarājācārya

गित्कित्ङिन्निमित्ते इग्लक्षणे गुणवृद्धी न स्तः।

भूयात्। भूयास्ताम्। भूयासुः। भूयाः। भूयास्तम्। भूयास्त। भूयासम्।

भूयास्व। भूयास्म।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४३३- क्ङिति च। ग् च क्, ङ् च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः क्कङः, ते इतो यस्य स क्ङित्, तस्मिन्। क्ङिति सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इको गुणवृद्धी इस सम्पूर्ण सूत्र और न धातुलोप आर्धधातुके से न का अनुवर्तन किया जाता है।

गित्, कित् और ङित् को निमित्त मानकर इक् के स्थान पर होने वाले गुण और वृद्धि नहीं होते।

विधिसूत्र और निषेधसूत्र एकस्थानीय होते हैं अर्थात् एक ही स्थान पर प्रवृत्त होते हैं।

संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च।

अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम्।

इस सूत्र लक्षण में निषेधसूत्र को विधिसूत्र की कोटि में माना गया है। इस लिए यह सूत्र भी विधिसूत्र ही है। यह व्यापक सूत्र है। इसकी बहुत आवश्यकता पड़ेगी। इसलिए इस सूत्र पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

भूयात्। भू धातु से आशिषि लिङ्लोटौ के द्वारा आशीर्वाद अर्थ में लिङ् लकार और उसके स्थान पर प्रथमपुरुष का एकवचन ति आया, भू ति बना। ति की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा प्राप्त, उसे बाधकर लिङाशिषि से आर्धधातुकसंज्ञा हुई। सार्वधातुक न होने से कर्तरि शप् से शप् नहीं हुआ। भू+ति में यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से ति को यासुट् का आगम हुआ, अनुबन्धलोप करने पर यास् बचा। टित् होने के कारण ति के आदि में आकर बैठा- भू यास् ति बना। यास् को किदाशिषि से कित्व हुआ। अर्थात् उसको कित् जैसा मान लिया गया। भू+यास् ति में ति का जो आर्धधातुकत्व है, वह उसके आगम में भी आ जाता है। अतः यास् इस आर्धधातुक को मानकर सार्वधातुकार्धधातुकयोः

से भू में ऊकार को गुण प्राप्त था, उसे निषेध करने के लिए सूत्र आया- क्ङिति च। जब यासुट् को किद्वद्भाव किया गया तो यास् कित् हुआ। इस कित् को मानकर प्राप्त भू के ऊकार के स्थान पर जो गुण है, उसका निषेध हुआ, अर्थात् गुण नहीं हुआ। ति में इकार का इतश्च से लोप हुआ तो बना भू यास् त्। स् और त् के बीच में कोई अच् नहीं है, अतः स्त् की हलोऽनन्तराः संयोगः से संयोग-संज्ञा हुई और संयोग के आदि में स्थित वर्ण सकार का स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से लोप हुआ तो बना- भूयात्।

भूयास्ताम्। भू धातु से लिङ्, प्रथमपुरुष का द्विवचन तस्, यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् हुआ भू+यास्+तस् बना, यास् को कित् करके गुण का अभाव, तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से तस् के स्थान पर ताम् आदेश, भूयास्ताम् बना। यहाँ पर स् और त् का संयोग न तो पदान्त में है और न ही इससे झल् परे है। इसलिए स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से सकार का लोप नहीं हुआ और भूयास्ताम् सिद्ध हुआ।

भूयासुः। भू लिङ्, भू झि, इमेर्जुस् से जुस्, अनुबन्धलोप, भू+उस्, यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् हुआ, भू+यास्+उस् बना, यास् को किद्वद्भाव करके गुण का निषेध, वर्णसम्मेलन करके भूयासुस् बना। सकार को रुत्व और विसर्ग करके भूयासुः यह सिद्ध हुआ।

भूयाः। भू से मध्यमपुरुष का एकवचन सिप्, अनुबन्धलोप, यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् हुआ भू+यास्+सि बना, यास् को कित् करके गुण का अभाव, सि के सकार का इतश्च से लोप करके भू+यास्+स् बना। पूर्व सकार का स्कोः संयोगाद्योरन्ते च लोप और दूसरे सकार को रुत्वविसर्ग करके भूयाः सिद्ध हो जाता है।

भूयास्तम्। भूयास्त। मध्यमपुरुष के द्विवचन और बहुवचन थस् और थ आये। यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् हुआ भू+यास्+थस् और भू+यास्+थ बने, यास् को कित् करके गुण का अभाव, तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से थस् के स्थान पर तम् आदेश, और थ के स्थान पर त आदेश, वर्णसम्मेलन करके भूयास्तम् और भूयास्त बनाइये।

भूयासम्, भूयास्व, भूयास्म। उत्तमपुरुष में क्रमशः मिप्, वस्, मस् प्रत्यय। यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् हुआ- भू+यास्+मि, भू+यास्+वस् और भू+यास्+मस् बने। यास् को कित् करके गुण का अभाव, भूयास्+मि में अम् आदेश और वस् मस् के सकार का नित्यं ङितः से लोप एवं शेष प्रक्रिया पूर्ववत् करके उक्त रूप सिद्ध होते हैं। ४३४- लुङ्। लुङ् प्रथमान्तम्, एकपदमिदं सूत्रम्। भूते, धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार चला आ रहा है।