Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 432
कित्वविधायकमतिदेशसूत्रम्
किदाशिषि
Aṣṭādhyāyī 3.4.104
Vṛtti Varadarājācārya

आशिषि लिङो यासुट् कित्। स्कोः संयोगाद्योरिति सलोपः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४३२- किदाशिषि। कित् प्रथमान्तम्, आशिषि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। लिङः सीयुट् से लिङः की और यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् की अनुवृत्ति आती है।

आशीर्वाद अर्थ में विहित लिङ् लकार के स्थान पर हुए तिङ् को किया गया यासुट् आगम किद्वद्भाव को प्राप्त होता है।

यासुट् तो यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से होगा किन्तु वहाँ किसी ककार की इत्संज्ञा नहीं है, अतः कित् नहीं हैं। अविद्यमान कित् को कित् अर्थात् किद्वद्भाव का अतिदेश इसके द्वारा हो रहा है। कित् करने के अनेक प्रयोजन हैं, जो आगे जाकर स्पष्ट होंगे।