लिङो झेर्जुस् स्यात्।
भवेयुः। भवेः। भवेतम्। भवेत। भवेयम्। भवेव। भवेम।
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४३०- झेर्जुस्। झेः षष्ठ्यन्तं, जुस् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में लिङः सीयुद् से लिङः की अनुवृत्ति आती है।
लिङ् लकार के स्थान पर हुए झि पूरे के स्थान पर जुस् आदेश होता है।
जुस् में जकार की चुटू से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर केवल उस ही बचता है।
भवेयुः। भू धातु से लिङ्, उसके स्थान पर प्रथमपुरुष का बहुवचन झि, उसके स्थान पर झोऽन्तः से अन्त् आदेश प्राप्त था, उसको बाधकर झेर्जुस् से जुस् आदेश, जुस् में जकार की इत्संज्ञा और लोप, भू उस्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, गुण, अवादेश, यासुद्
आगम, अनुबन्धलोप, भव+यास्+उस् हुआ। लिङ्ः सलोपोऽनन्त्यस्य से यास् के सकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर यास् के स्थान पर अतो येयः से इय् आदेश होकर भव+इय्+उस् बना है। वल् प्रत्याहार वाले वर्ण के परे न मिलने पर यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप नहीं हुआ। भव+इय् में आद्गुणः से गुण हुआ तो भवेय् उस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ, भवेयुस् बना, सकार का रुत्वविसर्ग हुआ- भवेयुः।
भवेः। मध्यमपुरुष का एकवचन सिप्, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, गुण, अवादेश, यासुट्, अनुबन्धलोप, यकार का लोप, भव+इ में गुण, भवेसि बना, इकार का इतश्च से लोप और सकार का रुत्व विसर्ग होकर भवेः सिद्ध होता है।
भवेतम्। भू लिङ्, मध्यमपुरुष द्विवचन थस्, भू थस्, भू शप् थस्, भू अ थस्, भो अ थस्, भव+थस्, भव+तम्, भव यास् तम्, भव इय् तम्, भवेय् तम्, भवेतम्।
भवेत। भू लिङ्, मध्यमपुरुष बहुवचन थ, भू थ, भू शप् थ, भू अ थ, भो अ थ, भव थ, भव त, भव यास् त, भव इय् त, भवेय् त, भवेत।
भवेयम्। भू लिङ्, उत्तमपुरुष का एकवचन मिप्, भू मिप्, भू अ मि, भो अ मि, भव मि, भव अम्, भव यास् अम्, भव इय् अम्। भवेय् अम्, भवेयम्।
भवेव। भवेम। उत्तमपुरुष में द्विवचन और बहुवचन में लकार के स्थान में वस् और मस् आदेश, शप्, गुण, यास्, इय्, गुण, यकार का लोप, सकार का नित्यं ङितः से लोप करके भवेव, भवेम ये बन जाते हैं।
पहले ही बताया जा चुका है आशीर्वाद अर्थ में दो लकार हैं- लोट् और लिङ्। लोट् लकार के विषय में तो लोट् च सूत्र में आप पढ़ चुके हैं। अब लिङ् लकार के विषय में बता रहे हैं। वैसे तो लिङ् लकार के विषय में भी आप पढ़ चुके हैं किन्तु लिङ् लकार विधिलिङ् और आशीर्लिङ् दो भागों में बँटा हुआ है क्यों कि आशीर्वाद अर्थ में जो लिङ् उसके लिए भिन्न सूत्र बने हुए हैं और विधि आदि अर्थ में हुए लिङ् लकार के लिए भिन्न सूत्र बने हुए हैं। इसी प्रकार आशीर्वाद अर्थ में हुए लिङ् की आर्धधातुकसंज्ञा होती है और विधि आदि अर्थ में हुए लिङ् की सार्वधातुकसंज्ञा होती है। ऐसे कई अनेकों कारण हैं कि लिङ् लकार दो भागों में बँट जाता है।
दस लकारों में से लेट् लकार का प्रयोग केवल वेद में ही किये जाने के कारण लोक में केवल नौ लकार ही रह गये थे किन्तु लिङ् लकार को आशीर्लिङ् और विधिलिङ् करके दो भाग बना दिये जाने से पुनः दस ही लकार हो गये हैं।