भवेत्। भवेताम्।
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४२९- लोपो व्योर्वलि। व् च य् च व्यौ, तयोर्व्योः। लोपः प्रथमान्तं, व्योः षष्ठ्यन्तं, वलि सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
वल् प्रत्याहार के परे रहने पर पूर्व में विद्यमान वकार और यकार का लोप होता है।
भवेत्। भू धातु से विधि आदि अर्थ में विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् से लिङ् लकार का विधान हुआ, उसके स्थान पर प्रथमपुरुष का एकवचन तिप् आया, अनुबन्धलोप होने के बाद उसकी सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप होकर भू अ ति बना। गुण, अवादेश होकर भव+ति बना। लिङ् लकार सम्बन्धी ति को यासुद् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुद् का आगम, अनुबन्धलोप, टित् होने के कारण ति के आदि में बैठा भव यास् ति बना। लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य से यास् के सकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर अतो येयः से यास् के स्थान पर इय् आदेश हुआ- भव इय् ति बना। भव+ इय् में आद्गुणः से गुण हुआ- भवेय् ति बना। यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप हुआ- भवेति बना। ति के इकार का इतश्च से लोप हुआ तो बना- भवेत्।
भवेताम्। भू धातु से विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् से लिङ् लकार का विधान हुआ, उसके स्थान पर प्रथमपुरुष का द्विवचन तस् आया, सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, अनुबन्धलोप, धातु को गुण, अवादेश करके भव+तस् बना। तस् के स्थान पर तस्थस्थमिपां तान्तन्तामः से ताम् आदेश हुआ तो भव+ताम् बना। तस् को यासुद् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुद् का आगम, अनुबन्धलोप, टित् होने के कारण ताम् के आदि में बैठा भव+यास्+ताम् बना। लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य से यास् के सकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर अतो येयः से यास् के स्थान पर इय् आदेश हुआ- भव+इय्+ताम् बना। भव+इय् में आद्गुणः से गुण हुआ- भवेय् ताम् बना। यकार का लोपो व्योर्वलि से लोप होकर भवेताम् बना।