एष्वर्थेषु धातोर्लिङ्।
४२५- विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। विधिश्च निमन्त्रणञ्च आमन्त्रणञ्च अधीष्टञ्च, सम्प्रश्नश्च, प्रार्थनञ्च विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनानि, तेषु विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु। विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु सप्तम्यन्तं, लिङ् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न, प्रार्थन अर्थों में धातु से लिङ् लकार होता है।
यह सूत्र काल के विषय को लेकर लकार का विधान नहीं कर रहा है।
विधि- अपने से छोटे अर्थात् पुत्र, भाई, सेवक आदि को आज्ञा देना विधि कहाता है। जैसे- तुम पुस्तक दो, बेटे! घर जाओ आदि।
निमन्त्रण- अवश्य-कर्तव्य में प्रेरणा देने को निमन्त्रण कहते हैं। जैसे- श्राद्ध आदि कार्य में दौहित्र अर्थात् अपनी लड़की के लड़के का भी भोजन अनिवार्य होता है तो वहाँ यह अनिवार्यरूप से भोजनार्थ आना ही है इस प्रकार से प्रेरणा देना ही निमन्त्रण है।
आमन्त्रण- ऐसी प्रेरणा का नाम आमन्त्रण है कि जिसमें प्रेरक तो प्रेरणा देगा किन्तु जिसे प्रेरणा दी जाती है वह उस कार्य को करे या नहीं अर्थात् कामचारिता, अपनी इच्छा पर निर्भर होती है। जैसे- आप सभी सत्संग में आमन्त्रित हैं इस वाक्य से यह स्पष्ट होता है कि सत्संग में जाने की प्रेरणा मिल रही है किन्तु हमें अपनी व्यवस्था के अनुसार जाना है। यदि अवकाश है तो जा सकते हैं, नहीं तो न जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं है।
अधीष्ट- किसी बड़े गुरु आदि को सत्कारपूर्वक किसी कार्य को करने की प्रेरणा देना। जैसे किसी आचार्य से कहा जाय कि आप मेरे पुत्र को पढ़ायें।
सम्प्रश्न- किसी बड़े के समीप एक निश्चयार्थ प्रश्न करना सम्प्रश्न कहलाता है। जैसे- गुरु जी! या पिता जी! मैं वेद पढ़ूँ या व्याकरण?
प्रार्थना- मांगने का नाम प्रार्थन (प्रार्थना) है। जैसे मैं पानी पीना चाहता हूँ।
आशीर्वाद- वक्ता का किसी दूसरे के लिए अप्राप्त वस्तु की कामना करना आशीर्वाद कहाता है। जैसे- किसी को कहा जाय कि आप दीर्घजीवी हों, आपको सम्पदा मिले आदि।