Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 405
डारौरसादेशविधायकं विधिसूत्रम्
लुटः प्रथमस्य डारौरसः
Aṣṭādhyāyī 2.4.85
Vṛtti Varadarājācārya

'डा-रौ-रस्' एते क्रमात् स्युः। डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेलोपः। भविता।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४०५- लुटः प्रथमस्य डारौरसः। डाश्च रौश्च रश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः- डारौरसः। लुटः षष्ठ्यन्तं, प्रथमस्य षष्ठ्यन्तं, डारौरसः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

लुट् लकार के प्रथमपुरुष के स्थान पर क्रमशः डा, रौ, रस् ये आदेश होते हैं।

परस्मैपद में तिप् के स्थान पर डा, तस् के स्थान पर रौ और झि के स्थान पर रस् आदेश तथा आत्मनेपद में त के स्थान पर डा, आताम् के स्थान पर रौ और झ के स्थान पर रस् आदेश होंगे।

भविता। भू-धातु से कर्ता अर्थ में अनद्यतने लुट् से लुट्-लकार का विधान, अनुबन्धलोप हुआ। लकार के स्थान पर तिप् आदेश, अनुबन्धलोप। भू+ति में ति की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा हुई और कर्तरि शप् से शप् प्राप्त हुआ, उसे बाध कर स्यतासी लृलुटोः से तासि-प्रत्यय हुआ। तासि में इकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप हुआ। भू+तास्+ति बना। तास् धातु से विहित है, तिङ् और शित् से भिन्न भी है। अतः इसकी आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञा हुई और आर्धधातुकस्येङ्वलादेः से तास् को इट् का आगम हुआ तो बना भू+इ+तास्+ति। भू+इ में सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, भो+इ बना, एचोऽयवायावः से अव् आदेश होकर भू+अव्+इ बना, वर्णसम्मेलन होने पर- भवि बना, आगे तास् ति भी है। भवितास् ति में ति के स्थान पर लुटः प्रथमस्य डारौरसः से डा आदेश हुआ। डकार की चुट् से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप, भवितास् आ बना। भवितास् में अन्त्य अच् है ता का आकार, वह सकार के आदि में है। अतः आस् की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा हुई और डिद्विधानसामर्थ्यात् भसंज्ञा न होने पर भी टेः इस सूत्र से टिसंज्ञक आस् का लोप हुआ तो बना- भवित् आ। भवित्+आ में वर्णसम्मेलन होने पर भविता सिद्ध हुआ।