Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 404
आर्धधातुकसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
आर्धधातुकं शेषः
Aṣṭādhyāyī 3.4.114
Vṛtti Varadarājācārya

तिङ्शिद्भ्योऽन्यो धातोरिति विहितः प्रत्यय एतत्संज्ञः स्यात्। इट्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४०४- आर्धधातुकं शेषः। आर्धधातुकं प्रथमान्तं, शेषः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्।

धातु से विहित एवं तिङ् और शित् से भिन्न प्रत्यय आर्धधातुकसंज्ञक होते हैं।

अष्टाध्यायी में इस सूत्र से पहले तिङ्शित्सार्वधातुकम् पढ़ा गया है। अतः इस सूत्र में शेष का अर्थ हुआ- तिङ् और शित् से शेष क्योंकि उक्तादन्यः शेषः अर्थात् कहने से बचा हुआ जो भी है, वह शेष है। धातु से विहित जितने भी प्रत्यय होंगे, उनमें यदि तिङ् और शित् न हों तो उनकी आर्धधातुकसंज्ञा होती है। यह सूत्र व्यापक है, कृदन्त आदि में भी लगता है। अतः इस सूत्र को ठीक से समझना चाहिए।