अहंयुः अहङ्कारवान्। शुभंयुः शुभान्वितः।
इति मत्वर्थीयाः॥५६॥
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११९६- अहंशुभमोर्युस्। अहं च शुभं च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्व अहंशुभमौ, तयोः। अहंशुभमोः पञ्चम्यर्थे षष्ठी। युस् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य
अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।
अहम् और शुभम् इन दो अव्ययों से परे मत्वर्थ में युस् प्रत्यय होता है।
अहम् और शुभम् ये प्रथमान्त समान दीखने वाले अव्यय हैं। सकार इत्संज्ञक है, यु बचता है। सित् होने के कारण पूर्व की सिति च से पदसंज्ञा हो जाती है, जिससे पदान्तकार्य अनुस्वार-परसवर्ण आदि हो जाते हैं।
अहंयुः। अहंकार वाला, घमंडी। अहम् अस्यास्तीति। अहम् इस मकारान्त अव्यय से अहंशुभमोर्युस् से युस् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अहम्+यु बना। सिति च से अहम् की पदसंज्ञा होने के कारण मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और उसका वा पदान्तस्य से विकल्प से परसवर्ण होकर अहंयु बना। इससे स्वादि कार्य करके अहंयुः, अहंयू, अहंयवः आदि रूप बनते हैं। परसवर्ण न होने के पक्ष में अनुस्वार ही रह जाता है जिससे अहंयुः, अहंयू, अहंयवः आदि रूप बनते हैं।
शुभंयुः। शुभता से युक्त, कल्याणवाला। शुभम् अस्यास्तीति। शुभम् इस मकारान्त अव्यय से अहंशुभमोर्युस् से युस् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, शुभम्+यु बना। सिति च से शुभम् की पदसंज्ञा होने के कारण मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और उसका वैकल्पिक परसवर्ण होकर शुभंयु बना। इससे स्वादि कार्यकरके शुभंयुः, शुभंयू, शुभंयवः आदि रूप बनते हैं। पक्ष में शुभंयुः, शुभंयू, शुभंयवः।
परीक्षा
इस प्रकरण के सभी सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं बीस प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
मत्वर्थीयप्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ प्राग्दिशीयाः