लिटः कानच् क्वसुश्च वा स्तः। तङ्गनावात्मनेपदम्। चक्राणः।
८२९- क्वसुश्च। क्वसुः प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। लिटः कानच् वा से लिटः और वा की अनुवृत्ति आती है।
लिट् के स्थान पर क्वसु आदेश भी विकल्प से होता है।
इन दोनों का सम्मिलित अर्थ भी किया जा सकता है। वह इस तरह से- लिट् के स्थान पर कानच् और क्वसु आदेश विकल्प से होते हैं।
इन दो सूत्रों से पूर्वसूत्र छन्दसि लिट् से सामान्य भूतकाल में लिट् लकार होता है। वेद में उसी के स्थान पर इन दो सूत्रों के द्वारा कानच् और क्वसु प्रत्यय हो जाते हैं। अतः कानच् और क्वसु प्रत्ययान्त शब्द भी वेद में ही प्रयुक्त होते हैं परन्तु क्वसु-प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग कवियों ने कहीं-कहीं किया है। जैसे कि रघुवंश में कालिदास ने- तं तस्थिवांसम्, श्रेयांसि सर्वाण्यधिजग्मुषः आदि प्रयोग किया है।
कानच् की तङ्गनावात्मनेपदम् से आत्मनेपदसंज्ञा होती है। कानच् में आन और क्वसु में वस् बचता है।
चक्राण। कृ धातु से लिट् के स्थान पर कानच् आदेश करके अनुबन्धलोप करने पर कृ+आन बना। स्थानिवद्भावेन आन को लिट् मान कर के लिटि धातोरनभ्यासस्य से कृ को द्वित्व, उरत्, रपर, हलादिशेष, चुत्व करके चकृ+आन बना। आन लिट् का अपित् है, अतः असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव हो गया है। अतः सार्वधातुकार्थधातुकयोः से प्राप्त गुण का विङ्ति च से निषेध हो जाता है। फलतः चकृ+आन में इको यणचि से यण् होकर चक्राण बनता है। प्रातिपदिकसंज्ञा, स्वादिकार्य करके चक्राणः सिद्ध हो जाता है। ८३०- म्वोश्च। म् च व् च म्वौ, तयोः म्वोः। म्वोः सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। मो नो धातोः यह पूरा सूत्र आता है।