Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 788
कप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
आतश्चोपसर्गे
Aṣṭādhyāyī 3.1.136
Vṛtti Varadarājācārya

प्रज्ञः। सुग्लः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८८- आतश्चोपसर्गे। आतः पञ्चम्यन्तम्, चाव्ययम्, उपसर्गे सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः से कः की अनुवृत्ति आती है। धातो:, प्रत्यय:, परश्च का अधिकार है। उपसर्गे उपपदे आदन्ताद्धातो: कः स्यात्।

उपसर्ग के उपपद रहते आकारान्त धातुओं से क प्रत्यय होता है।

ककार की इत्संज्ञा होती है। यहाँ कित् का फल आकार का लोप करना है। तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा की जाती है। अभी यहाँ पर उपपद का अर्थ समीप ही समझें। विशेष अर्थ उसी सूत्र में स्पष्ट करेंगे।

प्रज्ञः। प्रजानातीति। अधिक जानने वाला। प्र उपसर्ग पूर्वक ज्ञा (अवबोधने) आकारान्त धातु है। इससे क प्रत्यय हुआ। प्र+ज्ञा+अ बना। आतो लोप इटि च से धातु के आकार का लोप हुआ। प्र+ज्ञ्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर प्रज्ञ बना। स्वादिकार्य होकर प्रज्ञः।

सुग्लः। सुग्लायतीति। अधिक थकने वाला। सु उपसर्ग पूर्वक ग्लै हर्षक्षये धातु है। पहले आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व होकर आतोश्चोपसर्गे से क प्रत्यय और आतो लोप इटि च से आकार का लोप होकर स्वादिकार्य होने परह सुग्लः सिद्ध हो जाता है। ७८९- गेहे कः। गेहे सप्तम्यन्तं, कः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। विभाषा ग्रहः से ग्रहः की अनुवृत्ति आती है और धातो:, प्रत्यय:, परश्च का अधिकार है।