Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 20
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VṛttiGovind
LSK 691
ह्रस्वविधायकं विधिसूत्रम्
प्वादीनां ह्रस्वः
Aṣṭādhyāyī 7.3.80
Vṛtti Varadarājācārya

पूञ्-लूञ्-स्तूञ्-कृञ्-वृञ्-धूञ्-शृ-पृ-वृ-भृ-मृ-दृ-जृ-झृ-धृ-नृ-

कृ-ऋ-गृ-ज्या-री-ली-व्ली-प्लीनां चतुर्विंशतेः शिति ह्रस्वः।

पुनाति, पुनीते।

पविता। लूञ् छेदने॥११॥

लुनाति, लुनीते।

स्तूञ् आच्छादने॥१२॥

स्तृणाति। शर्पूवाः खयः। तस्तार, तस्तरतुः।

तस्तरे। स्तरीता, स्तरिता। स्तृणीयात्, स्तृणीत। स्तीर्यात्॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६९१- प्वादीनां ह्रस्वः। प्वादीनां षष्ठ्यन्तं, ह्रस्वः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ष्ठिवुक्लमुचमां शिति से शिति की अनुवृत्ति आती है।

शित् परे होने पर पूञ्, लूञ्, स्तूञ्, कृञ्, वृञ्, धूञ्, शृ, पृ, वृ, भृ, मृ, दृ, जृ, झृ, धृ, नृ, कृ, ऋ, गृ, ज्या, री, ली, व्ली और प्ली धातुओं को ह्रस्व होता है।

लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ् में श्ना के शित्व के कारण ह्रस्व करने के लिए यह लगेगा, शेष लकारों में नहीं लगेगा।

पुनाति। पू-धातु से लट्, तिष्, श्ना करके पू+नाति बना। प्वादीनां ह्रस्वः से पू के ऊकार को ह्रस्व होने पर- पुनाति। इस प्रकार से परस्मैपद में रूप बनते हैं- पुनाति, पुनीतः, पुनन्ति। पुनासि, पुनीथः, पुनीथ। पुनामि, पुनीवः, पुनीमः। आत्मनेषद में- पुनीते, पुनाते, पुनते। पुनीषे, पुनाथे, पुनीध्वे। पुने, पुनीवहे, पुनीमहे। शेष लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं, शेष रूपों को आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।

लिट्- पुपाव-पुपुवे। लृट्- पविता, पवितासि-पवितासे। लृट्- पविष्यति-पविष्यते। लोट्- पुनातु-पुनीताम्। लङ्- अपुनात्-अपुनीत। विधिलिङ्- पुनीयात्-पुनीत। आशीर्लिङ्- पूयात्-पविषीष्ट। लुङ्- अपावीत्-अपविष्ट। लृङ्- अपविष्यत्-अपविष्यत।

लूञ् छेदने। लूञ् धातु काटना अर्थ में है। यह भी पूञ् की तरह ही उभयपदी है और सेद् है। इसकी ह्रस्व आदि सम्पूर्ण प्रक्रिया पूञ् की तरह ही होती है अर्थात् पूञ् की तरह ही इसके रूप बनते हैं। इसके सभी लकारों के प्रथमपुरुष के एकवचन के ही रूप दिये जा रहे हैं, शेष रूपों को आप स्वयं बनाने का प्रयत्न करें।

लट्- लुनाति-लुनीते। लिट्- लुलाव-लुलुवे। लुट्- लविता, लवितासि-लवितासे।

लृट्- लविष्यति-लविष्यते। लोट्- लुनातु-लुनीताम्। लङ्- अलुनात्-अलुनीत। विधि

लिङ्- लुनीयात्-लुनीत। आशीर्लिङ्- लूयात्-लविषीष्ट। लुङ्- अलावीत्-अलविष्ट।

लृङ्- अलविष्यत्-अलविष्यत।

स्तृञ् आच्छादने। स्तृञ् धातु ढकना अर्थ में है। ञित् होने के कारण उभयपदी

और ऋदन्त होने के कारण सेट् है। शित् के परे होने पर प्वादीनां ह्रस्वः से ह्रस्व होता है।

लिट् में ऋच्छत्यृताम् से गुण हो जाता है। आशीर्लिङ् में ऋत इट् धातोः से इत्त्व, रपर

आदि भी होते हैं। इट् में वृतो वा से विकल्प से इट् को दीर्घ होता है।

लट्- स्तृणाति। स्तृणीते। लिट्- तस्तार, तस्तरे। लृट्- स्तरीता-स्तरिता,

स्तरीतासि-स्तरितासि, स्तरीतासे, स्तरितासे। लृट्- स्तरीष्यति-स्तरिष्यति, स्तरीष्यते-स्तरिष्यते।

लोट्- स्तृणातु, स्तृणीताम्। लङ्- अस्तृणात्, अस्तृणीत। विधिलिङ्- स्तृणीयात्, स्तृणीत।

आशीर्लिङ् के आत्मनेपद में वैकल्पिक इट् आगम के लिए अग्रिम सूत्र है।