Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 15
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VṛttiGovind
LSK 635
सम्प्रसारणविधायकं विधिसूत्रम्
ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च
Aṣṭādhyāyī 6.1.16
Vṛtti Varadarājācārya

एषां सम्प्रसारणं स्यात् किति डिति च।

विध्यति। विव्याध। विविधतुः। विविधुः। विव्यधिथ, विव्यद्ध। व्यद्धा।

व्यत्स्यति। विध्येत्।

विध्यात्। अव्यात्सीत्। पुष पुष्टौ॥१०॥

पुष्यति।

पुषोष। पुषोषिथ। पोष्टा। पोक्ष्यति।

पुषादीत्यङ्। अपुषत्। शुष शोषणे॥११॥

शुष्यति।

शुशोष। अशुषत्। णश अदर्शने॥१२॥

नश्यति। ननाश। नेशतुः।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

व्यध ताडते। व्यध धातु ताडन अर्थात् बींधना अर्थ में है। बाण आदि के द्वारा

लक्ष्य करके बींधना आदि कहा जा सकता है। उदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है। व्यध् शेष

रहता है। परस्मैपदी और अनिट् है।

६३५- ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनां डिति च। ग्रहिश्च

ज्याश्च वयिश्च व्यधिश्च वष्टिश्च विचतिश्च वृश्चतिश्च पृच्छतिश्च भृज्जतिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो

ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतयः, तेषां ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-

वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनाम्। ग्रहि-ज्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-

वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनां षष्ठ्यन्तं, ङिति सप्तम्यन्तं, च अव्ययं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

वचिस्वपियजादीनां किति से किति की तथा ष्यङः सम्प्रसारणम् से सम्प्रसारणम् की

अनुवृत्ति आती है।

ग्रह, न्या, वय, व्यध, वश, व्यच्, व्रश्च, प्रच्छ और भ्रस्ज् इन धातुओं को

सम्प्रसारण होता है कित् या ङित् प्रत्यय के परे होने पर।

विध्यति। व्यध् से लट्, तिप्, श्यन्, अनुबन्धलोप होने पर व्यध्+यति बना। श्यन्

का य अपित् सार्वधातुक होने के कारण सार्वधातुकमपित् से ङित् है। अतः व्+य्+अ+ध्=व्यध्

के यकार के स्थान पर ग्रहि-न्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-भृज्जतीनां

ङिति से सम्प्रसारण होकर इकार हो गया। व्+इ+अ+ध् बना। इ+अ में सम्प्रसारणाच्च से

पूर्वरूप होकर इकार ही हो गया। इस तरह विध्+यति बना। वर्णसम्मेलन होकर विध्यति

सिद्ध हुआ। वकार का भी सम्प्रणार प्राप्त होता है किन्तु न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् से

निषेध हो जाता है। निषेधक सूत्र का अर्थ है- सम्प्रसारण के परे होने पर पूर्व को

सम्प्रसारण नहीं होता। इससे सिद्ध हो जाता है कि जहाँ दो वर्ण सम्प्रसारण के योग्य हों,

वहाँ पर पहले पर वर्ण को सम्प्रसारण होता है।

लट्- विध्यति, विध्यतः, विध्यन्ति आदि।

विव्याध। लिट् में व्यध्+अ बनने के बाद द्वित्व होकर व्यध्+व्यध्+अ बना।

लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से अभ्यास को सम्प्रसारण होकर पूर्वरूप होने पर हलादि शेष होने

के बाद विव्यध्+अ बना। उपधावृद्धि, वर्णसम्मेलन करके विव्याध बनता है। द्विवचन एवं

बहुवचन में कित् होने के कारण ग्रहि-न्या-वयि-व्यधि-वष्टि-विचति-वृश्चति-पृच्छति-

भृज्जतीनां ङिति च से पहले सम्प्रसारण होकर बाद में विध् को द्वित्व आदि कार्य होते हैं।

विविध्+अतुस्=विविधतुः। थल् के कित्, ङित् न होने के कारण लिट्यभ्यासस्योभयेषाम्

से अभ्यास को सम्प्रसारण होता है। भारद्वाजनियम से थल् को इट् होने पर विव्यधिथ

और इट् न होने के पक्ष में विव्यध्+थ बनने के बाद झषस्तथोर्धोऽधः से थकार के स्थान

पर थकार आदेश और पूर्वधकार को जश्त्व होकर विव्यद्ध बनता है। लिट् के वस् और मस्

में क्रादिनियम से नित्य से इट् हो जाता है।

लिट् के रूप- विव्याध, विविधतुः, विविधुः, विव्यधिथ-विव्यद्ध, विविधथुः,

विविध, विव्याध-विव्यध, विविधिव, विविधिम।

लुट्- में इट् का अभाव है। व्यध्+ता में झषस्तथोर्धोऽधः से तकार को थकार

होकर पूर्वधकार को जश्त्व होकर दकार होता है। व्यद्धा, व्यद्धारौ, व्यद्धारः, व्यद्धासि,

व्यद्धास्थः आदि।

लृट्- व्यध्+स्यति में थकार को खरि च से चर्त्व होकर तकार होता है। व्यत्स्यति,

व्यत्स्यतः, व्यत्स्यन्ति आदि। लोट्- विध्यतु-विध्यतात्, विध्यताम्, विध्यन्तु आदि। लङ्- अविध्यत्,

अविध्यताम्, अविध्यन् आदि। विधिलिङ्- विध्येत्, विध्येताम्, विध्येयुः आदि। आशीर्लिङ्- में

कित् होने के कारण सम्प्रसारण होता है। विध्यात्, विध्यास्ताम्, विध्यासुः आदि।

लुङ्- के तिप् में अव्यध्+स्+ईत् बनने के बाद वदव्रजहलन्तस्यार्चः से वृद्धि

होकर थकार को खरि च से चर्त्व होता है, अव्यात्सीत्। तस् में अव्याध्+स्+ताम् बनने के

बाद झलो झलि से सकार का लोप, झषस्तथोर्धोऽधः से तकार को थकार और पूर्वधकार

को जश्त्व होकर दकार होने पर अव्याद्धाम् बनता है। झि के स्थान पर सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च

से जुस् आदेश होने पर अव्याध्+स्+उस् बना है। झल् के परे न होने के कारण सकार का

लोप नहीं हुआ। अव्यात्सुः।

लृङ् के रूप- अव्यात्सीत्, अव्याद्धाम्, अव्यात्सुः, अव्यात्सीः, अव्याद्धम्, अव्याद्ध,

अव्यात्सम्, अव्यात्स्व, अव्यात्स्म। लृङ्- अव्यत्स्यत्, अव्यत्स्यताम् आदि।