Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 427
सकारलोपविधायकं विधिसूत्रम्
लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य
Aṣṭādhyāyī 7.2.79
Vṛtti Varadarājācārya

सार्वधातुकलिङोऽनन्त्यस्य सस्य लोपः। इति प्राप्ते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

४२७- लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य। अन्ते भवोऽन्त्यः, न अन्त्यः अनन्त्यः, तस्य अनन्त्यस्य। लिङः षष्ठ्यन्तं, स लुप्तषष्ठीकं पदं, लोपः प्रथमान्तम्, अनन्त्यस्य षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। रुदादिभ्यः सार्वधातुके से विभक्तिविपरिणाम करके सार्वधातुकस्य की अनुवृत्ति आती है।

सार्वधातुक लिङ् के अनन्त्य सकार का लोप होता है।

अन्त्य में न हो, ऐसे सकार का ही लोप प्राप्त होता है। भव+यास्+त् में सकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर अग्रिम सूत्र लगता है। यह सूत्र सार्वधातुक के सकार का लोप करता है आर्धधातुक सकार का नहीं। यास् की स्वतः सार्वधातुकसंज्ञा या आर्धधातुकसंज्ञा तो नहीं होती किन्तु आगम होने के कारण यदि सार्वधातुक को आगम हुआ है तो सार्वधातुक के ग्रहण से सार्वधातुक और आर्धधातुक को आगम हुआ है तो आर्धधातुक के ग्रहण से आर्धधातुक होता है। एक परिभाषा है- यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते। आगम-जिसको कहे जाते हैं उसी के अङ्ग होते हैं और उसी के ग्रहण से उनका ग्रहण होता है। जिसको आगम हुआ है, वह जिस गुण वाला है, आगम भी उसी गुण वाला हो जाता है। जैसे आगमी यदि णित् है तो आगम भी णित् और आगमी ङित् है तो आगम भी ङित् ही होगा। अतः यह यासुट् सार्वधातुक लिङ् अर्थात् विधिलिङ् में यह सार्वधातुक माना जायेगा और आशीर्लिङ् में लिङ् आर्धधातुक होने के कारण यह आर्धधातुक माना जायेगा।