कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे धातोः शप्।
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३८७- कर्तरि शप्। कर्तरि सप्तम्यन्तं, शप् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति है।
कर्ता अर्थ में किये गये सार्वधातुकसंज्ञक प्रत्यय के परे रहने पर धातु से शप् प्रत्यय होता है।
शप् में पकार की हलन्त्यम् से और शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है। केवल अ ही बचता है। यह शप् प्रकृति धातु और प्रत्यय तिङ् के बीच में होता है। अतः प्रकृतिप्रत्यययोर्मध्ये यः पतति स विकरणः अर्थात् प्रकृति और प्रत्यय के बीच में जो होता है, वह विकरण है, इस नियम से शप् को विकरण माना जाता है। भ्वादि में शप् होता है। अतः भ्वादिगणीय धातु को शब्विकरणधातु कहा जाता है।